ब्रजेश की बात को सुनकर लगा कि पूरा जीवन ही बेलैंस का खेल है। बेलैंस खोया कि सब कुछ ही भरभरा कर गिर जाता है। इतनी ऊँचाई पर पंहुचने के लिए बहुत नीचे से शुरू करना होता है।
पैरों को बांस पर बने इस ठीये पर बांधना होता है और फिर इन्हें उठा कर एक दम खड़ा कर दिया जाता है। खड़ा करते ही ये अपना संतुलन बनाना शुरू करते हैं। पूछने पर बताया कि पहले केवल एड़ी की ऊँचाई से शुरू करते हैं और धीरे धीरे फिर ऊँचाई बढ़ाते जाते हैं। इतनी ऊँचाई पर एक दम से नहीं पहुंच जाते हैं, बहुत धीरे-धीरे शुरूआत होती है, ऊँचाई पर पंहुचतने की और इतनी ऊँचाई पर टिके रहने के लिए लगातार हिलते डुलते रहना होता है।
मॉरल ऑफ द स्टोरी
यही है कि पहले
ऐड़ी जहॉं तक ऊँची हो, वहीं तक ऊँचाई को संतुलन बनाना होगा फिर धीरे-धीरे इतनी ऊँचाई
पर पहुंचें कि गिरने पर चोट न लगे और संतुलन ही आखिरी वह चीज़ है जिसे हासिल किया
जाना है।

6 टिप्पणियां:
बहुत अच्छा। निरंतर लिखते रहिए।शुभकामनाएं।
बढ़िया प्रभु
बढ़िया प्रभु
जी, धन्यवाद। विश्वास दिलाता हूँ, लिखना निरंतर रखूँगा।
धन्यवादजी।
टिप्पणी के लिए आभार...
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