हम लोग उस दौर में टेकरे मोहल्ले पर रहते थे। टेकरे मोहल्ले और बलड़ी रोड़ में जमीन आसमान का अंतर था। क्योंकि बलड़ी रोड़, हरसूद में धरातल के हिसाब से सबसे नीची जगह थी और टेकरा मोहल्ला सबसे ऊँची। खैर आरामशीन की बात बाद में बताऊँगा विस्तार से।
टेकरा मोहल्ला नाम शायद इसलिए पड़ा होगा कि वह हरसूद में धरातल के मान से सबसे ऊँची जगह थी। बिलकुल टेकरे पर। उसी क्षेत्र का एक दूसरा नाम भी था, राजा गली। अब राजा गली नाम क्यों था, क्योंकि जाहिर सी बात है कि मैं, राजेन्द्र वहॉं रहता था। भाई, जस्ट किडिंग। पुराने लोग बताते थे कि हरसूद में एक राजा रहता था, उसका महल इसी गढ़ी में था। उस राजा के रहने के कारण, इस जगह का नाम राजा गली हो गया होगा, ऐसा मेरा सोचना है और शायद सच भी यही है। कहॉं तो राजा और अब कहॉं बची उसकी गली...और अब तो वह भी नहीं बची, डूब गयी वो राजा गली और डूब गया गया वह टेकरा मोहल्ला, जिसे कभी गुमान रहा होगा अपने टेकरे होने का। उस दौर में तांगे चलते थे, हरसूद में और तांगे वाले भी कहते थे कि टेकरे मोहल्ला जाने में ज्यादा पैसे देने होंगे, क्योंकि वो टेकरे पर है।
टेकरे मोहल्ले में ही हरसूद की सबसे रहस्यमयी जगह थी, और वह थी गढ़ी। गढ़ी के बारे में सैकड़ोंं किस्से और कहानियॉं प्रचलित थी। कल्लू नाई और उसका भाई सुंदर और इन दोनों की मॉं बड़की, ये उस जगह पर रहते थे, जहॉं से गढ़ी की सरहद चालू होती थी। कल्लू नाई वो शख्स, इसी नाम से जाना जाता था, श्रीकृष्णा बस पर ड्रायवर थे, एक एक्सीडेंट में उनकी एक टॉंग जाती रही और उस गरीब परिवार पर जैसे काल का क्रूर, काला साया ही पड़ गया। बाद में कल्लू चाचा, टॉंगा चलाने लगे थे। कुछ समय तक चलाया फिर बाद में क्या हुआ, पता नहीं।क्योंकि हम लाेग फिर वहॉं से बलड़ी रोड पर आरा मशीन कारखाने में रहने आ गए थे। उनका एक लड़का धम्मू, अशोक बाथोले का खास मित्र था, हम लोग भी उसके साथ खेलते थे मगर ज्यादा नहीं। तो उस गढ़ी को उस समय के कुम्हारों नें इतना खोदा इतना खोदा कि वह जो टेकरा था, वह एक बड़े गडडे में तब्दील हो चुका था। बाबूलाल और मुल्लू कुम्हार, उन दिनों गढ़ी से मिटटी खोद-खोद कर और गधे से उसको ढो-ढो कर मकान बनाने के लिए पांडर मिटटी लोगों के घर पटका करते थे। ये लोग कालीमाचक नदी से काली रेत भी डालते थे।
एक बार हमारे छोटे भैया ने जिद कर ली कि मुझे गधे पर बैठाओ। मुल्लू ने कहा कि भैया, मत बैठो, दिक्कत में आ जाओगे, मगर वो माने नहीं और गधे पर जैसे तैसे बैठ गए। वो गधा इतना सरपट भागा कि कालीमाचक नदी पर ही जा कर रूका और हमारे भैयाजी, वहॉं से पैदल घर आए। गधे की पूँछ के बाल काट कर उसे एक बॉंस की कमची में बॉंध कर तार वाले बाजे पर फिराया जाता था और उससे मधुर आवाज आती थी, ये प्रयोग उन दिनों आम थे। डालडे के टीन के डब्बे में एक देढ़ फिट का पतला बॉंस फंसा कर उसमें तार बॉंध दिया जाता था, उस तार पर स्ट्रोक मार कर मंगते भिखारी गीत/भजन गाया करते थे, बॉंस के दूसरे सिरे पर वो तार, एक हिलने वाली खूँटी पर बंधा रहता था। उसे खूंटी को हिला कर तार से तरह तरह की आवाजें निकला करती थी। इस तरह के बाजे अब नहीं देखने को मिलते हैं। उन दिनों ये आम बाजे हुआ करते थे।
उस समय पहली बार एक नया शब्द सुनने में आया था, रायल्टी। रायल्टी क्या होता है, ये तो उस समय पता नहीं था मगर इन लोगों को जब पैसा दिया जाता था तो किलकिल किया करते थे कि बाबूजी, पैसे कम दे रहे हो, रायल्टी देना पड़ता है। ये लोग किसे और किस बात की रायल्टी देते थे, पता नहीं मगर यह शब्द बड़ा रॉयल लगता था, रायल्टी।
बाबूलाल कुम्हार का एक लड़का, बुध्दु, मेरा खास दोस्त था। उसकी बत्तीसी में सामने का एक ऊपर का दॉंत काला सा था, क्यों था, कब से था ? ये तो नहीं पता मगर मेरा देखा वह पहला इंसान देखा था, जिसका दॉंत इस तरह का था। मुझे पढ़ने का शौक तो बचपन से ही था, उन दिनों बालभारती बच्चों की पत्रिका आया करती थी, पिताजी ग्वालियर में थे उन दिनों। उनको भी पढ़ने में काफी दिलचस्पी थी। शायद उनकी वजह से ही हम तीनों भाईयों में पढ़ने का शौक था। उन्होने ही आदत डाली थी। बालभारती में पुरातत्व के बारे में कुछ लेख पढ़े थे, गुणाकर मुलेजी के। बुध्दु से एक दिन मैने पूछा कि तुम मिटटी खोदते हो तो उसमें कभी कोई सिक्का मिला है ? बुध्दु ने कहा कि गंज बार मिला। मैने उससे कहा कि अब मिले तो एक सिक्का मेरे को भी ला कर देना। एक दिन वो आया और तॉंबे का खुरमें जैसा एक सिक्का थमा गया। उसमें उरदू या अरबी में कुछ था। तभी कहीं से पता चला कि रेल की पटरी पर जो भी धातु रखो, वह इंजन के गुजर जाने के बाद चुंबक बन जाती है। मैने यह प्रयोग उस सिक्के पर कर डाला। हमारा घर स्टेशन से बहुत दूर था। दूर क्या था, स्टेशन ही हरसूद से बहुत दूर था। सिक्का मिलने के बाद, मैं स्टेशन गया और सिक्के को लेकर। आप जानते ही हो कि फिर क्या हुआ होगा ?
हरसूद के ऊपर बहुत कुछ यहॉं से देखें
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