बुधवार, 1 मार्च 2023

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हरसूद में मेरा आना


 हम लोग उस दौर में टेकरे मोहल्‍ले पर रहते थे। टेकरे मोहल्‍ले और बलड़ी रोड़ में जमीन आसमान का अंतर था। क्‍योंकि बलड़ी रोड़, हरसूद में धरातल के हिसाब से सबसे नीची जगह थी और टेकरा मोहल्‍ला सबसे ऊँची। खैर आरामशीन की बात बाद में बताऊँगा विस्‍तार से।

टेकरा मोहल्‍ला नाम शायद इसलिए पड़ा होगा कि वह हरसूद में धरातल के मान से सबसे ऊँची जगह थी। बिलकुल टेकरे पर। उसी क्षेत्र का एक दूसरा नाम भी था, राजा गली। अब राजा गली नाम क्‍यों था, क्‍योंकि जाहिर सी बात है कि मैं, राजेन्‍द्र वहॉं रहता था। भाई, जस्‍ट किडिंग। पुराने लोग बताते थे कि हरसूद में एक राजा रहता था, उसका महल इसी गढ़ी में था। उस राजा के रहने के कारण, इस जगह का नाम राजा गली हो गया होगा, ऐसा मेरा सोचना है और शायद सच भी यही है। कहॉं तो राजा और अब कहॉं बची उसकी गली...और अब तो वह भी नहीं बची, डूब गयी वो राजा गली और डूब गया गया वह टेकरा मोहल्‍ला, जिसे कभी गुमान रहा होगा अपने टेकरे होने का। उस दौर में तांगे चलते थे, हरसूद में और तांगे वाले भी कहते थे कि टेकरे मोहल्‍ला जाने में ज्‍यादा पैसे देने होंगे, क्‍योंकि वो टेकरे पर है।

टेकरे मोहल्‍ले में ही हरसूद की सबसे रहस्‍यमयी जगह थी, और वह थी गढ़ी। गढ़ी के बारे में सैकड़ोंं किस्‍से और कहानियॉं प्रचलि‍त थी। कल्‍लू नाई और उसका भाई सुंदर और इन दोनों की मॉं बड़की, ये उस जगह पर रहते थे, जहॉं से गढ़ी की सरहद चालू होती थी। कल्‍लू नाई वो शख्‍स, इसी नाम से जाना जाता था, श्रीकृष्‍णा बस पर ड्रायवर थे, एक एक्‍सीडेंट में उनकी एक टॉंग जाती रही और उस गरीब परिवार पर जैसे काल का क्रूर, काला साया ही पड़ गया। बाद में कल्‍लू चाचा, टॉंगा चलाने लगे थे। कुछ समय तक चलाया फिर बाद में क्‍या हुआ, पता नहीं।क्‍योंकि हम लाेग फिर वहॉं से बलड़ी रोड पर आरा मशीन कारखाने में रहने आ गए थे। उनका एक लड़का धम्‍मू, अशोक बाथोले का खास मित्र था, हम लोग भी उसके साथ खेलते थे मगर ज्‍यादा नहीं। तो उस गढ़ी को उस समय के कुम्‍हारों नें इतना खोदा इतना खोदा कि वह जो टेकरा था, वह एक बड़े गडडे में तब्‍दील हो चुका था। बाबूलाल और मुल्‍लू कुम्‍हार, उन दिनों गढ़ी से‍ मिटटी खोद-खोद कर और गधे से उसको ढो-ढो कर मकान बनाने के लिए पांडर मिटटी लोगों के घर पटका करते थे। ये लोग कालीमाचक नदी से काली रेत भी डालते थे।

एक बार हमारे छोटे भैया ने जिद कर ली कि मुझे गधे पर बैठाओ। मुल्‍लू ने कहा कि भैया, मत बैठो, दिक्‍कत में आ जाओगे, मगर वो माने नहीं और गधे पर जैसे तैसे बैठ गए। वो गधा इतना सरपट भागा कि कालीमाचक नदी पर ही जा कर रूका और हमारे भैयाजी, वहॉं से पैदल घर आए। गधे की पूँछ के बाल काट कर उसे एक बॉंस की कमची में बॉंध कर तार वाले बाजे पर फिराया जाता था और उससे मधुर आवाज आती थी, ये प्रयोग उन दिनों आम थे। डालडे के टीन के डब्‍बे में एक देढ़ फिट का पतला बॉंस फंसा कर उसमें तार बॉंध दिया जाता था, उस तार पर स्‍ट्रोक मार कर मंगते भिखारी गीत/भजन गाया करते थे, बॉंस के दूसरे सिरे पर वो तार, एक हिलने वाली खूँटी पर बंधा रहता था। उसे खूंटी को हिला कर तार से तरह तरह की आवाजें निकला करती थी। इस तरह के बाजे अब नहीं देखने को मिलते हैं। उन दिनों ये आम बाजे हुआ करते थे।

उस समय पहली बार एक नया शब्‍द सुनने में आया था, रायल्‍टी। रायल्‍टी क्‍या होता है, ये तो उस समय पता नहीं था मगर इन लोगों को जब पैसा दिया जाता था तो किलकिल किया करते थे कि बाबूजी, पैसे कम दे रहे हो, रायल्‍टी देना पड़ता है। ये लोग किसे और किस बात की रायल्‍टी देते थे, पता नहीं मगर यह शब्‍द बड़ा रॉयल लगता था, रायल्‍टी।

बाबूलाल कुम्‍हार का एक लड़का, बुध्‍दु, मेरा खास दोस्‍त था। उसकी बत्‍तीसी में सामने का एक ऊपर का दॉंत काला सा था, क्‍यों था, कब से था ? ये तो नहीं पता मगर मेरा देखा वह पहला इंसान देखा था, जिसका दॉंत इस तरह का था। मुझे पढ़ने का शौक तो बचपन से ही था, उन दिनों बालभारती बच्‍चों की पत्रि‍का आया करती थी, पिताजी ग्‍वालियर में थे उन दिनों। उनको भी पढ़ने में काफी दिलचस्‍पी थी। शायद उनकी वजह से ही हम तीनों भाईयों में पढ़ने का शौक था। उन्‍होने ही आदत डाली थी। बालभारती में पुरातत्‍व के बारे में कुछ लेख पढ़े थे, गुणाकर मुलेजी के। बुध्‍दु से एक दिन मैने पूछा कि तुम मिटटी खोदते हो तो उसमें कभी कोई सिक्‍का मिला है ? बुध्‍दु ने कहा कि गंज बार मिला। मैने उससे कहा कि अब मिले तो एक सिक्‍का मेरे को भी ला कर देना। एक दिन वो आया और तॉंबे का खुरमें जैसा एक सिक्‍का थमा गया। उसमें उरदू या अरबी में कुछ था। तभी कहीं से पता चला कि रेल की पटरी पर जो भी धातु रखो, वह इंजन के गुजर जाने के बाद चुंबक बन जाती है। मैने यह प्रयोग उस सि‍क्‍के पर कर डाला। हमारा घर स्‍टेशन से बहुत दूर था। दूर क्‍या था, स्‍टेशन ही हरसूद से बहुत दूर था। सिक्‍का मिलने के बाद, मैं स्‍टेशन गया और सिक्‍के को लेकर। आप जानते ही हो कि फिर क्‍या हुआ होगा ?

हरसूद के ऊपर बहुत कुछ यहॉं से देखें


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बुधवार, 22 फ़रवरी 2023

Verbatimशब्दश:Verbatimका हिन्दीमेंअर्थhindi

 


गूगल में जब आप सर्च करते हैं तब वह दो तरह से खोज करता है, एक तो उसके आस पास के और मिलते जुलते शब्दों के आधार पर all result दूसरा ऑप्शन होता है, Verbatim इस शब्द का मतलब होता है, शब्दश: यानि कि जो आपने टाईप किया है, ठीक वही का वही। आपको जब इस तरह से सर्च करना हो तो आप इस ऑप्शन का उपयोग कर अपनी  सर्च को और अधि‍क एक्यूरेसी से कर सकते हैं।

शनिवार, 18 फ़रवरी 2023

हरसूद/https://exuberantrmbhopal.wordpress.com/

हरसूद के बारे में बहुत दिनों से एक ब्‍लॉग का विचार बन रहा था। आज उसे अमली जामा पहना ही दिया। आज तो बस उसे शुरू किया है, धीरे-धीरे हरसूद से संबंधित सभी जानकारी और फोटो अपलोड करना शुरू कर दिया है। हालांकि ये काम मुझे 2004 से ही शुरू कर देना था, मगर कुछ जानकारी का अभाव, कुछ समय का अभाव और कुछ इच्‍छा शक्ति का अभाव इसका कारण रहे कि मैं ऐसा कर नहीं पाया था। अब इसे पूरा करना ही है। पुराना एक ब्‍लॉग ब्‍लॉग स्‍पाट पर बनाया था मगर अब वह पेज दिखता है, एक्‍सेस नहीं हो पाता है। मैने उसका पीछा छोड़ दिया और नयी वेबसाईट बना ही ली।   

हरसूद https://exuberantrmbhopal.wordpress.com


मंगलवार, 14 फ़रवरी 2023

पाॅब्‍लो पिकासो

पाॅब्‍लो पिकासो एक महान पेंटर थे कलाकार थे। उनकी महानता की झलक, उनके कहे वाक्‍यों से भी जानी जा सकती है। वे महान बन सके क्‍योंकि उनकी मॉं ने बचपन में उनसे कहा था कि जो भी करो, सीधे शीर्ष ही तुम्‍हारी मंजिल होना चाहिए। वे पेंटर बने तो पेंटर के शीर्ष पर पहुँँचे।
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पिकासो का जीवन देखें तो पता चलता है कि महानता बीज रूप में बचपन में बो दी जाती है। बाद के समय में तो वह बस विकसित ही होती है। बचपन में मॉं के रोपे विचार ने पिकासो का मार्ग प्रशस्‍त किया। ठीक इसका उल्‍टा भी देखा जा सकता है कि मॉं यदि नकारात्‍मक विचारों के बीज बो दे तो बच्‍चा फिर जीवन भर कुछ खास नहीं कर पाता है। इसे सिध्‍दांत के रूप में तो नहीं लिया जा सकता है मगर इस बात से बच्‍चों के मन पर पड़ने वाली छाप का पता चलता है। बच्‍चों के कोमल मन पर किस बात की छाप कैसे पड़ जाती है और वह विकसित होते होते क्‍या असर दिखाती है, इसे अलबर्ट आंइस्‍टाईन के बचपन से भी देखा जा सकता है, कहानी क‍हती है कि वे बचपन में मंद बुध्दि थे और स्कूल ने उनकी  मॉं को कहा कि आपका बच्‍चा मंद बुध्दि है और इसे कृपा कर अपने घर ले जाएं और आप ही पढ़ाएं तब मॉं ने अलबर्ट से क्‍या कहा यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है। आप इसे झूठ कह सकते हैं किन्तु हर वास्तविक सच, अपने बचपन में एक झूठ ही होता है। वह झूठ ही विकसित हो कर वास्तविकता में बदलता है। हर वैज्ञानिक एक तथाकथि‍त झूठ पर ही काम करता है, जिसे संकल्पना कहा जाता है, एक हाईपोथि‍सिस पर ही वह कार्य करता है, जो शेष विश्व के लिए उस समय वास्तविक नहीं होती किन्तु उस वैज्ञानिक के लिए वही मानसिक रूप से सच होता है, जिसके आधार पर वह अपना कार्य करता चला जाता है और एक दिन, वही तथाकथि‍त झूठ, सच में तब्दील हो जाता है। तो आंस्टाईन की मॉं ने अपने बच्चे से कहा,

कि 
तुम यूनिक और स्‍पेशल हो 
और 
यह स्‍कूल 
तुम्‍हें नहीं पढ़ा सकती  
इस बात से अलबर्ट को बचपन से ही अहसास हो गया कि 
वह यूनिक है, एक्‍सट्रा आर्डनरी है
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वहीं भारत में 
आम माताएं अपने बच्‍चों को जाने अनजाने में 
क्‍या कहती हैं, बानगी देखिए

तू नालायक है...

तू कामचोर है...

तू मक्‍कार है...

तू हरामखोर है...

तू बेशर्म है...

हम क्‍या उम्‍मीद कर सकते हैं, ऐसे बच्‍चे के बारे में जो ये इसी तरह के मिलते जुलते वाक्‍य डेली बेसिस पर रोज-रोज सुनता है। उसका अवचेतन क्‍या संग्रहित करता है और जाहिर है वह जीवन में क्‍या तो कर ही पाएगा। वह निश्चित ही अपने अवचेतन से बहुत कुछ वास्तविकता में बदल लेता है और अपने को बचपन में कहे वाक्यों के आधार पर ढाल लेता है। अपने मॉं-बाप के कहे शब्दों को चरितार्थ करता है। मॉं-बाप कहते हैं, हमारा बच्चा नालायक निकल गया। काश, मॉं-बाप लायक होते....।
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बच्‍चों से 
बहुत सोच समझ कर बात करें, 
वे आप की बात को बहुत गौर से सुनते और गुनते हैं
आपको  सुन कर वे भविष्य का अपना फाउंडेशन बना रहे हैं 
 

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2023

 

मध्यप्रदेश राज्य के नियम, अधि‍नियमों और कानूनों के संग्रह की

एक महत्वपूर्ण वेबसाईट

https://www.code.mp.gov.in/

वेबसाईट में मध्यप्रदेश राज्य के अधिनियमों और नियमों का डिजिटल संग्रह है। 

स वेबसाईट पर शासन के द्वारा जारी सभी नियम, अधि‍नियम, आदेश और अन्य संबंधि‍त जानकारियों का समावेश किया गया है। यदि शासन के किसी खास विभाग के किसी नियम की जानकारी चाहते हैं तो इस वेबसाईट पर दिए गए ऑप्शन बॉक्स में अपने ऑप्शन चुनकर, जानकारी पीडीएफ फार्मेट में हासिल कर सकते हैं। यह वेबसाईट खास तौर पर विधि‍क व्यवसाय में संलग्न प्रोफेशनल्स के लिए बहुत उपयोगी है, जिनको राज्य शासन के विभि‍न्न नियम, अधि‍नियम और इसी तरह की अन्य जानकारियों की जरूरत पड़ती रहती है।

मध्‍य प्रदेश के राज्‍य अधिनियम, इन अधिनियमों के अंतर्गत बनाये गये नियम, स्‍वतंत्र रूप से बनाये गये राज्‍य के अन्‍य नियम कुछ महत्‍वपूर्ण केन्‍द्रीय अधिनियम एवं राज्‍य द्वारा इनमें किये गये संशोधन वेबसाईट में बहुत ही व्यवस्थि‍त रूप और क्रमबध्द रूप से सम्मिलित किये गये हैं ।

 

इसमें मूल पाठ के साथ ही केन्‍द्रीय कानूनों/नियमों में राज्‍य द्वारा किए गए संशोधनों को भी सम्म‍िलित किया गया है।

 

उपयोगकर्ता (यूजर) द्वारा इस वेबसाइट के मुख्‍य पृष्‍ठ पर दिखाई गई जानकारी के अनुसार उपलब्‍ध नियम, कानून और अधिसूचनाओं से संबंधित लिंक्‍स पर क्लिक करने पर उस पर विषय से संबंधि‍त विस्‍तृत सूची को देखा जा सकता है तथा अपने चाहे गए शीर्षक अथवा लिंक पर क्लिक करके तत्संबंधि‍त  विस्‍तृत जानकारी को न केवल देख, पढ़ सकते हैं, उसे पीडीएफ में प्राप्‍त भी किया जा सकता है। 


इस वेब पोर्टल पर उपलब्‍ध कराई गई सामग्री न केवल कानून या विधिक क्षेत्र के शोधकर्ताओंइस क्षेत्र में कार्यरत व्यवसायियोंअधिवक्‍तागण एवं विधिक क्षेत्र  से संबंधि‍त सभी नागरिकों के लिये उपयोगी होने के साथ-साथ जन प्रतिनिधियों एवं आम आदमी के सन्‍दर्भ कार्य में भी उपयोगी है। इस वेबसाईट का सबसे बड़ा फायदा तो यह  है कि एक की समय और जगह पर यह सभी डिजिटल फार्मेट में उपलब्ध है।

https://www.code.mp.gov.in/


इसी तरह की उपयोगी जानकारी को आप तक लाते रहने का प्रयास है


धन्‍यवाद 

बुधवार, 1 फ़रवरी 2023

नट-मॉरल-ऑफ-द-स्टोरी


 यह है साहिल और ब्रजेश, मध्यप्रदेश के दमोह जिले के हैं। पूछने पर बताया कि पेशे से नट हैं। नट वही लोग होते हैं जो अपने शारीरिक करतब दिखा कर अपना पेट पालते हैं। इतने ऊॅंचे बॉंस पर चढ़कर ये लोगों का मनोरंजन करते हैं। ब्रजेश का कहना है कि ये सब बैलेंस का खेल है।

ब्रजेश की बात को सुनकर लगा कि पूरा जीवन ही बेलैंस का खेल है। बेलैंस खोया कि सब कुछ ही भरभरा कर गिर जाता है। इतनी ऊँचाई पर पंहुचने के लिए बहुत नीचे से शुरू करना होता है।

पैरों को बांस पर बने इस ठीये पर बांधना होता है और फिर इन्हें उठा कर एक दम खड़ा कर दिया जाता है। खड़ा करते ही ये अपना संतुलन बनाना शुरू करते हैं। पूछने पर बताया कि पहले केवल एड़ी की ऊँचाई से शुरू करते हैं और धीरे धीरे फिर ऊँचाई बढ़ाते जाते हैं। इतनी ऊँचाई पर एक दम से नहीं पहुंच जाते हैंबहुत धीरे-धीरे शुरूआत होती हैऊँचाई पर पंहुचतने की और इतनी ऊँचाई पर टिके रहने के लिए लगातार हिलते डुलते रहना होता है।

मॉरल ऑफ द स्टोरी 

यही है कि पहले ऐड़ी जहॉं तक ऊँची हो, वहीं तक ऊँचाई को संतुलन बनाना होगा फिर धीरे-धीरे इतनी ऊँचाई पर पहुंचें कि गिरने पर चोट न लगे और संतुलन ही आखि‍री वह चीज़ है जिसे हासिल किया जाना है।


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